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रंगदारी प्रकरण: विधायक और ठेकेदार के बीच विवाद की परतें खुलीं

12 करोड़ की सड़क में कमिशनखोरी का आरोप

सुलतानपुर। जयसिंहपुर (सदर) विधानसभा क्षेत्र से जुड़ी पापरघाट-शाहपुर तक की लगभग 12 करोड़ रुपये की सड़क चौड़ीकरण परियोजना अब राजनीतिक घमासान और रंगदारी के आरोपों के बीच फंसती नजर आ रही है। सूत्रों के हवाले से जो जानकारियां सामने आई हैं, वो सत्ता पक्ष के लिए गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं।

मामला तब गरमाया जब निर्माण कंपनी ‘सिद्धार्थ इंफ्राहाइट’ की डायरेक्टर शशि सिंह ने सदर विधायक पर 25 लाख रुपये की रंगदारी मांगने का आरोप लगाया। अब अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, यह विवाद चहेते ठेकेदारों को काम दिलाने की कोशिश, बिना सहमति टेंडर डालने और 2% कमीशन की मांग से जुड़ा है।

बताया जा रहा है कि माननीय विधायक अपने करीबी ठेकेदारों को यह ठेका दिलाना चाहते थे, लेकिन जब ‘सिद्धार्थ इंफ्राहाइट’ ने बिना उनकी सहमति के टेंडर डाल दिया और उसे स्वीकृति भी मिल गई, तो यह “टीस” का कारण बना। इसी आंतरिक नाराजगी के चलते कथित रूप से कंपनी से 2% कमीशन की डिमांड की गई।

दारुलसफा में हुई थी ‘डील मीटिंग’

यह भी सामने आया है कि इस पूरे प्रकरण को लखनऊ स्थित दारुलसफा विधायक आवास पर बैठकों के ज़रिए हल करने की कोशिश हुई, जिसमें स्थानीय प्रमुख, जनप्रतिनिधियों के करीबी और ठेकेदारों के बीच मध्यस्थता की कवायद चली। कंपनी ने 1% कमीशन देने की पेशकश की, लेकिन विधायक पक्ष 2% से नीचे नहीं झुकने को तैयार थे।

काम तभी शुरू होगा जब कमीशन मिलेगा

सूत्रों के अनुसार, ठेकेदार से कहा गया कि जब तक 2% कमीशन नहीं मिलेगा, काम शुरू नहीं होगा, और कमीशन मिलने की स्थिति में ही विधायक भूमिपूजन कर काम की शुरुआत करेंगे। लेकिन बात बिगड़ गई। जैसे ही निर्माण साइट पर गिट्टी गिराई गई, वहां विधायक के समर्थक माने जा रहे लोग पहुंचे और लेबर, मजदूरों और ट्रक चालकों के साथ कथित मारपीट की गई, जिससे काम ठप हो गया।सिद्धार्थ इंफ्राहाइट की ओर से रंगदारी के आरोप में ईमेल, व्हाट्सएप, फैक्स सहित विभिन्न माध्यमों से पुलिस और शासन को शिकायतें भेजी गईं, लेकिन पिछले चार दिनों से एफआईआर के लिए भटकना पड़ रहा है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, आला अधिकारी पूरे मामले की जांच में जुटे हैं। मामले को तूल तब मिला जब सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने विधायक पर आरोप लगाते हुए ठेकेदार का वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया। उन्होंने सवाल किया कि भाजपा के विधायक अब वसूली एजेंट बन चुके हैं। उन्होंने यह भी कहा कि “जब तक इसमें शीर्ष नेतृत्व शामिल नहीं होता, ऐसी हिम्मत कोई विधायक नहीं कर सकता।

मीडिया मैनेजमेंट और डैमेज कंट्रोल फेल

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मामले को दबाने और विधायक की छवि सुधारने के लिए एक होटल में पत्रकारों के साथ बंद कमरे में मीटिंग हुई, जिसमें टेबल के नीचे से डैमेज कंट्रोल की रणनीति बनी। लेकिन यह योजना 24 घंटे भी नहीं चल सकी। विधायक की विवादित स्थल पर मौजूदगी का वीडियो सामने आने के बाद सभी दावे हवा हो गए। अब सवाल यह है कि क्या शासन-प्रशासन इस मामले की निष्पक्ष जांच कर पाएगा, या यह भी राजनीतिक दबाव में दबा दिया जाएगा? स्थानीय स्तर पर विधायक की छवि पर असर पड़ा है, पार्टी की साख पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं, और पूरे जिले में यह मामला जनता की जुबान पर है।

(विजयधर पाठक)

(विशेष संवाददाता)

(उत्तरप्रदेश)

 

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