
उत्तर प्रदेश के गांवों में कभी बड़े धूमधाम से मनाया जाने वाला नागपंचमी का पर्व आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। पहले जहां गांव-गांव में खेतों में गुजरिया और कजरी गीत गूंजते थे, वहीं अब खेतों में न रौनक दिखती है और न ही लोकगीतों की वो मधुर धुन सुनाई देती है।
नागपंचमी को गांव की महिलाएं सज-धज कर नागदेवता की पूजा करती थीं, बच्चे मिट्टी के सांप बनाकर खेलते और अखाड़ों में दंगल-कुश्ती का आयोजन होता था। वातावरण हर्षोल्लास मय होता था । पेड़ों की शाखाओं पर पड़े झूलों पर महिलाएं कजरी गाती थीं।
धीरे धीरे पउवां धरा हो मोरी धनिया, गोड़े घुंघुरवा बाजे ना
नैन राधिका की लड़ गयी मुरारी से, बड़ी होशियारी से ना
जैसे सुमधुर गीत सावन के महीने में चहुओर वातारण में चार चांद लगा देते थे जिससे सावनी बेला मधुमय हो जाती थी । महिलाओं के सामूहिक कजरी गीत से सावन की खुशबू बढ़ जाती थी। बुजुर्गों की मानें तो पहले नागपंचमी पर घर-घर में पूजा होती थी। लोग व्रत रखते, दीवारों पर गेरू और चूने से नाग देवता की आकृति बनाकर पूजा करते थे। लेकिन ये सब अब अतीत की यादें बनती जा रही हैं । आज की पीढ़ी न तो इन परंपराओं को जानती है और न ही उन्हें निभाने में रुचि लेती है। मंदिरों में पूजा-पाठ अब केवल रस्म अदायगी बनकर रह गई है। वहीं, अखाड़ों की मिट्टी सूखी पड़ी है, क्योंकि ना कुश्ती होती है और ना पहलवानों का उत्साह।
सांस्कृतिक जानकारों का मानना है कि आधुनिकता की दौड़ में लोक पर्व और परंपराएं पीछे छूटती जा रही हैं। यदि यही हाल रहा, तो आने वाले वर्षों में नागपंचमी जैसा पर्व केवल किताबों में ही देखा और पढ़ा जाएगा। समाज को चाहिए कि अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाने की जिम्मेदारी समझे और इन त्योहारों को फिर से जीवंत करने का प्रयास करे।
